पीला रंग उदासी का

फेंक गया है वो मौसम पर
पीला रंग उदासी का!

यह बादल है या बंजारा
फिरता रहता मारा-मारा
लहराता अंबर में जैसे
चीर किसी वनवासी का!

अब तो अक्सर चुप रहते हैं
आँखों से सपने बहते हैं
अँधियारे कैसे समझेंगे
क़िस्सा पूरनमासी का!

जग को जाना समझा छोड़ा
राहों का हर पत्थर तोड़ा
फिर भी कुछ तो बचा हुआ है
रिश्ता मगहर-काशी का!
Gyan Prakash Akul