Dr Wasif Quazi

ज़िन्दगी को एक गुलशन-सा सजाना पड़ता है
लाख हों गिरदाब, कश्ती को बचाना पड़ता है

बात जब रिश्तों की आए, भूल अपनी हर अना
रूठने वाले को अक्सर, ख़ुद मनाना पड़ता है

दर्द सीने में छुपा कर ज़िन्दगी तो कट गई
हाल पूछे जब कोई तो गुनगुनाना पड़ता है

लोग हाथों में नमक लेकर खड़े हैं घात में
ज़ख़्म अपना हर किसी से, अब छुपाना पड़ता है

रहगुज़र में जब अँधेरा घेर लेता है कभी
दीप उम्मीदों का सीने में जलाना पड़ता है

टूट कर भी ज़िन्दगी की महफ़िलों में आज भी
अश्क आँखों के छुपा कर मुस्कुराना पड़ता है

ज़िन्दगी की राह में जब पाँव ज़ख़्मी हों तभी
यार 'काज़ी' मंज़िलों की ओर जाना पड़ता है
Dr Wasif Quazi