Shazia niyazi

जब तक वो ख़ुश-जमाल है खिड़की के उस तरफ़
तकना मेरा मुहाल है खिड़की के उस तरफ़

नाबीना इंतज़ार तो कमरे में है पड़ा
बूढ़ा सा इक सवाल है खिड़की के उस तरफ़

अब मसलहत की कौन सी सूरत बनाऊँ मैं
जब फ़ाख़्ता निढाल है खिड़की के उस तरफ़

इक मनचले को इश्क़ ने जोगी बना दिया
ऐसी कोई मिसाल है खिड़की की उस तरफ़

सोने के ज़ेवरात हैं मख़मल का है लिबास
फिर भी मेरा ख़याल है खिड़की के उस तरफ़

बदला हुआ फ़ज़ाओं का लहजा है आज कल
किस ने बिछाया जाल है खिड़की के उस तरफ़

उस के ख़तों के एक मुनासिब जवाब में
लहरा दिया रुमाल है खिड़की के उस तरफ़

तू ने तो बस चराग़ बुझाया है शाज़िया
होने लगा वबाल है खिड़की के उस तरफ़
Shazia niyazi