अपने दम पे छू लिये हम जो कहीं ऊँचाइयाँ।
श्रेय लेने आ गई हैं देशभर की कुर्सियाँ।
पायदाने आख़िरी पर विश्वगुरु का दम लिये।
झूठ के जंजाल में उलझा रखी हैं बस्तियाँ।
झोलियों की ख़्वाहिशें भी मुट्ठियों में आ गईं।
और लापरवाहियों पर सध रही हैं चुप्पियाँ।
आपदा तत्काल राहत की रही हैं मुन्तज़िर।
और ज़िम्मेदार लिखते रह गए हैं चिट्ठियाँ।
लाश बहकर आख़िरी में साहिलों से आ लगी।
आश्रितों को एवज़ों में सांत्वना की रोटियाँ।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'