एक ही नाम पे इक उम्र बिताने वाले,
वो भी क्या लोग थे रिश्तों को निभाने वाले!
ये जो वीरान-सा लगता है मुहब्बत का शहर,
ये गुलिस्ताँ था, बताते हैं बताने वाले!
ग़म हमारा है, हमीं को है निभाना इससे,
आते-जाते हैं बस अफ़सोस जताने वाले!
एक वो जिसने नुमाइश की मेरे ज़ख़्मों की,
एक हम, उसके सभी ऐब छुपाने वाले!
संगे-मरमर के महल हमको सिखाएँ न वफ़ा,
हम समंदर पे अटल सेतु बनाने वाले!
हमने ताबीज़ दुआओं के पहन रक्खे हैं,
ख़ुद ही मिट जाते हैं, वो हमको मिटाने वाले!
Swarika Kirti