देवताओं से उन्हें कोई अपेक्षा अब नहीं है ,
लड़कियाँ अब भाग्य से संग्राम करना जानती हैं ।
रंग सिंदूरी किसी संकल्प में स्वीकार करके,
वो रंगीले पंख के सारे रंगों को छोड़ आईं ,
ये कहा उनसे गया था बाग सारा है उन्हीं का,
नासमझ थीं तितलियाँ,आकाश से मुंह मोड़ आईं,
ये समर्पण था कि हँस कर हार भी स्वीकार कर ली,
अन्यथा वो पक्ष में परिणाम करना जानती हैं l
जानती हैं प्रेम को सर्वस्व देना आज भी पर ,
प्रेम पर हों प्रश्न, सीता आज की सहती नहीं है
वो सभा से न्याय का अधिकार वापस ले चुकी है
पापियों से द्रोपदी अपनी व्यथा कहती नहीं है ,
इंद्र से कह दो, अहिल्याएँ भ्रमित होंगी नहीं अब,
वो स्वयं की चेतना को राम करना जानती हैं ।
चाभियाँ तर्कों की अपने हाथ में पकड़े हुए हैं
बंद ताले चुप्पियों के लड़कियाँ अब खोलती हैं,
आँगनों की अल्पनाओं में सदा भरती रहीं जो,
स्वप्न की रंगोलियों में रंग वो अब घोलती हैं ,
जो युगों के द्वार पर दीपक जलाती आ रही हैं,
वो समय का सूर्य अपने नाम करना जानती हैं।
Swarika Kirti