हम सबके भीतर रहता है
हर कोने में बुद्ध अधूरा!
त्यक्त किंतु सहचरी बनी हैं
जाने कितनी यशोधराएं
सुख-दुख पैदा करती रहतीं
उगती ढलती सौ तृष्णाएं
उड़का हुआ द्वार है मन का
मुक्त और अवरुद्घ अधूरा!
कितनी बार सहज होने को
घेरे रहती है असहजता
होठों पर तिरती मुस्कानें
आँखों से पानी है बहता
मध्यम मार्ग खोजता है मन
मुग्ध अधूरा, क्रुद्ध अधूरा!
एक अधूरापन ढोती है
थकी हुयी जीवन की यात्रा
एक खोज है इस जीवन में
किस-किसकी हो कितनी मात्रा?
कुछ भी पूरा नहीं हो सका
शांति अधूरी, युद्ध अधूरा!
Gyan Prakash Akul