उनके ख़्वाबों में, ख़यालों में कभी थे ही नहीं
शब के जुगनू थे, सितारों में कभी थे ही नहीं
तुम तो फूलों की तरह यूं ही महकते रहना
हम तो कांटे हैं गुलाबों में कभी थे ही नहीं
इक मरासिम तो सलीक़े से निभाते लेकिन
दिल से हम दूर निगाहों में कभी थे ही नहीं
ले गयी उनको हवा दूर दरख़्तों से कहीं
ख़ुश्क पत्ते तो बहारों में कभी थे ही नहीं
उम्र भर सर को झुका कर बड़े मसरूर रहे
दिल के सजदे तो नमाज़ों में कभी थे ही नहीं
अपनी आग़ोश में लेने को है बेताब अजल
जिंदगी तेरी पनाहों में कभी थे ही नहीं
होके नाकाम-ए-वफा़ ख़ुद पे ही रोएंगे सनम
सोच लेंगे तेरी राहों में कभी थे ही नहीं
रायगां हो गयी सदियों की मसाफ़त भी "अलीम"
मेरे अज़कार निसाबों में कभी थे ही नहीं
Aliem U khan