प्रेम पुष्पों से सुशोभित इस हृदय को
कल विरह का शूल भी सहना पड़ेगा
आज अधरों पर सजा उत्सव मिलन का
कल नयन में पीर का सागर भी होगा
रीति इस जग की रही ये युग-युगों से
है अगर मधुमास तो पतझड़ भी होगा
प्रेम-जल से सिक्त इस तन के सुमन को
वेदना की अग्नि में दहना पड़ेगा
प्रेम का दृष्टांत जिनको मानता जग
राग पीड़ा का उन्हें जपना पड़ा है
कृष्ण-राधा, राम-सीता, शिव-सती को
भी विरह की अग्नि में तपना पड़ा है
नेह रत्नों से अलंकृत मन महल को
भाग्य के भूचाल से ढहना पड़ेगा
संग चलने की शपथ लेकर बढ़े हम
मार्ग लेकिन दो दिशाओं में बँटे है
एक पल के स्वर्ग जैसे इस मिलन पर
अनगिनत वनवास के बादल घिरे हैं
प्रेम के इन दिव्य वरदानित क्षणों को
याद बनकर उम्र-भर रहना पड़ेगा
Sani Singh