ज़िंदगी की दौड़ में ख़ुशहाल लड़का

ज़िंदगी की दौड़ में ख़ुशहाल लड़का
वेदनाओं से जकड़ता जा रहा है

स्वप्न जो पलकों की कोरों ने बुने थे
वक़्त ने उनको धराशायी किया है
दीप की लौ माँगते जीवन तिमिर को
भाग्य ने झोंका पवन का दे दिया है
पीर की काली निशा कैसे कटेगी
भानु भूतल से बिछड़ता जा रहा है

भाग्य की रेखा अगर मुँह फेर ले तो
विश्व के संबंध सारे रूठते हैं
प्रेम के ये वज्र-से मज़बूत बंधन
भी विफल अस्तित्व से ही टूटते हैं
तप्त मन यह रिक्तता कैसे सहेगा
रेत-सा सबकुछ फिसलता जा रहा है

चेतना निस्पंद है, जीवन निरुत्तर
स्वप्न अंतर्मन का पत्थर हो गया है
कल जिसे सारा जगत अपना लगा था
आज वह ख़ुद से ही बे-घर हो गया है
काल की हर क्रूर बाधा से उलझते
प्राण का संबल बिखरता जा रहा है
Sani Singh