दर्पण की भी सीमाएँ हैं !

आँखों की अपनी पीड़ा है मन की अपनी पीड़ाएँ हैं!
दर्पण की भी सीमाएँ हैं!

बाँध अगर टूटा आँसू का
सब कुछ जल जल हो जाएगा
फिर से देख लिया यदि तुमने
चढ़ता सूरज ढल जाएगा

घोर निराशा है जीवन मे फिर भी थोड़ी आशाएँ हैं!
दर्पण की भी सीमाएँ हैं!

एक बंद में आलिंगन हो
एक बंद में वादे-सपने
जो तेरा परिचय करवाएं
ऐसे गीत मुझे अब रचने

जो कुछ मैं लिखता गाता हूँ वो सब तेरी कविताएँ हैं!
दर्पण की भी सीमाएँ हैं!

तब तो मैं पत्थर का ही था
मुझको इतनी समझ नहीं थी
मैं भंवरों-सा भटक रहा था
तुम फूलों सी महक रही थी

तुम हो गई प्रेम की देवी मेरे सर बस दुविधाएँ हैं!
दर्पण की भी सीमाएँ हैं!
देवेश त्रिपाठी

दर्पण की भी सीमाएँ हैं ! | We The Sukhanwar