सिर्फ़ एक दिन बचा अभी तक
राखी नहीं मिली सन्नो की।
'माँ! नम्बर है बन्द’ बताता
फ़ोन मिलाता भाई आया
माँ के चेहरे पर पल-भर को
मँडराई दुर्भाग्य की छाया
माँ समधिन को लगी कोसने
कोई फ़िक्र न सम्बन्धों की।
पापा के चेहरे पर उभरा
बाकी के दहेज का सदमा
बेटी, आँसू और बेबसी
हत्या, पेशी और मुक़दमा
चाहे कुछ भी हो, लड़ लेंगे
कोई फ़िक्र नहीं पैसों की।
तब तक द्वार बजा आया था
एक लिफ़ाफ़ा बनकर सावन
राखी के संग घुले मिले थे
हल्दी, अक्षत, रोली, चन्दन
तभी पिता ने माँ को देखा
झड़ी लग गई मुस्कानों की।
Gyan Prakash Akul