लब पर हमारे नाम की ज़ुम्बिश नहीं हुई
आँखों से उनके प्यार की बारिश नहीं हुई
ज़ाहिर ये दिल के ज़ख़्म सरे-बज़्म हो गए
लेकिन निगाहें यार से पुर्सिश नहीं हुई
इक बार ही हुई थी इनायत नज़र हमें
फिर उस हसीन वक़्त की गर्दिश नहीं हुई
माज़ी का दे सके न हवाला भी हम उन्हें
और उन हसीं लबों से भी लर्ज़िश नहीं हुई
उमड़ा तमाम प्यार फ़ज़ाओं का फूल पर
क्या ख़ार के ख़िलाफ़ ये साज़िश नहीं हुई?
दिल की गिरह जो खोलते मिट जाते फ़ासिले
लेकिन कभी भी प्यार से कोशिश नहीं हुई
अब जी रहे हैं 'व्यास' जिगर में ख़लिश लिए
मरहम की इसलिए कभी ख़्वाहिश नहीं हुई
Himanshu Vyas