Dr Wasif Quazi

मसर्रत के गुल अब तो खिलने लगे हैं
जो बिछड़े हुए थे वो मिलने लगे हैं

उजाले लुटाने की ख़ातिर ही हम तो
दिए बन के महफ़िल में जलने लगे हैं

हुईं ख़ुश्क मुद्दत से जो ये निगाहें
जमे दर्द दिल के पिघलने लगे हैं

दिखाया ज़माने को सच जब से हमने
दिलों में सभी के खटकने लगे हैं

नशा है उन्हें जब से पाई हुकूमत
अभी से वो तेवर बदलने लगे हैं

दिलों में उजाले बढ़े हैं यकायक
फ़रेबों के साये सिमटने लगे हैं

बढ़ा है हुजूम-ए-बग़ावत अचानक
मुसाहिब सभी अब खिसकने लगे हैं

अरे 'काज़ी' क्या पूछते हो ग़ज़ल का
ये मिसरे तो दिल से निकलने लगे हैं
Dr Wasif Quazi