मैं जब भी अपनी दुनिया सोचता हूँ!
उसे मैं खुद से ऊँचा सोचता हूँ!
वो अब भी सिर्फ़ अपना सोचती है
मैं अब भी सिर्फ़ उसका सोचता हूँ!
छलक आते हैं इन आँखों में आँसू
उसे जब हद से ज़्यादा सोचता हूँ!
लगी है रोग जब से शायरी की
भरी महफिल में तन्हा सोचता हूँ!
किया मैंने नहीं जो वक़्त रहते
करेगा मेरा बेटा सोचता हूँ?
ग़रीबी है सुदामा जैसी मेरी
कहाँ है यार कान्हा सोचता हूँ?
पुराने ख़त को लेकर हाँथ में अब
वही क़िस्सा पुराना सोचता हूँ!
कभी क्या मिल सकेंगे हम दुबारा?
मैं बिलकुल आप जैसा सोचता हूँ!
Santosh sagar