कब तक खुला रहेगा ये दफ़्तर नहीं पता
जाऊँगा कब को अपने ही मैं घर नहीं पता
किससे करूँ मैं दोस्ती किससे करूँ मैं प्यार
काँधे पे किसके दुख में रखूँ सर, नहीं पता
कोई नुजूमी पढ़ न सका हाँथों की लकीर
कैसा लिखा है मेरा मुक़द्दर नहीं पता
करता नहीं किसी से कभी भेद-भाव मैं
मुझको तो जात-पात में अंतर नहीं पता
तुझसे बिछड़के कुछ तो बनूँगा ज़रूर मैं
शायर बनूँगा या कोई अफ़सर नहीं पता
मैं तो नहीं हूँ, ये मिरी आदत भी है नहीं
ये कौन रो रहा मेरे अंदर, नहीं पता!
मेरे लिये जो नींव का पत्थर बना है वो
क्या बन सकेगा मील का पत्थर नहीं पता?
Santosh sagar