जीवन पग-पग फिसल रहा है आकर इसे सम्हालो तो।सूख रहे रिश्तों के तरु में नीर नेह का डालो तो।मतभेदों से क्या मिलना है चार दिनों के जीवन में।मैं खो दूँ मेरे 'मैं' को तुम अपना अहं निकालो तो।अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'