पीड़ा के पर्वत के आगे
खुद को तुम असमर्थ न करना।
मानव! जीवन व्यर्थ न करना।।
निज स्वभाव व्यालों के भय से उचित नहीं बदला जाना।
भीतर अगर सुवास भरी तो स्वाभाविक जग महकाना।
कटना छिलना और सूखकर पाषाणों पर संघर्षण।
जीवन है संदल घिसकर ही संभव सुर-सिर चढ़ पाना।।
कुछ सिक्कों के रंच लोभ में
खोकर स्वत्व अनर्थ न करना।।
मानव! जीवन व्यर्थ न करना।।
बेशकीमती गौहर गहराई में रहता अनजाना।
जिसने लहर-थपेड़े झेले उनको जग ने पहचाना।
एकाकी तट के संवादी किन्तु मूल्य से हीन नहीं हैं।
मणिकर की संगत में संभव नग को कीमत मिल पाना।।
नि:श्वासों में पीर पिरोना
पर उच्छ्वास तदर्थ न करना।
मानव! जीवन व्यर्थ न करना।।
श्रम स्वेदों का अलंकरण ही सदा सोहता यौवन में।।
क्रन्दन को कलरव करने का कौशल भाता जीवन में।
इच्छाओं की जड़ता में गति अंगीकार सदा होती।
स्वप्न-पुष्प मुरझाते रहते अंतर्मन के उपवन में।।
हार स्वयं को प्रेम बचाया
उन मौनों का अर्थ न करना।
मानव! जीवन व्यर्थ न करना।।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'