Dr Wasif Quazi

मसर्रत के गुल अब तो खिलने लगे हैं
जो बिछड़े हुए थे वो मिलने लगे हैं

उजाले लुटाने की ख़ातिर ही हम तो
दिए बनके महफ़िल में जलने लगे हैं

बहुत दिन से सूखी हुई थीं निगाहें
लहू बनके आँसू छलकने लगे हैं

नये इक सफ़र पर रवाँ हम हुए हैं
हवाओं के तेवर बदलने लगे हैं

उन्हें मिल गई है ज़रा-सी हुकूमत
यहाँ लोग हक़ को कुचलने लगे हैं

अरे 'काज़ी' क्या पूछते हो ग़ज़ल का
ये मिसरे तो दिल से निकलने लगे हैं
Dr Wasif Quazi

Dr Wasif Quazi | We The Sukhanwar