मसर्रत के गुल अब तो खिलने लगे हैं
जो बिछड़े हुए थे वो मिलने लगे हैं
उजाले लुटाने की ख़ातिर ही हम तो
दिए बनके महफ़िल में जलने लगे हैं
बहुत दिन से सूखी हुई थीं निगाहें
लहू बनके आँसू छलकने लगे हैं
नये इक सफ़र पर रवाँ हम हुए हैं
हवाओं के तेवर बदलने लगे हैं
उन्हें मिल गई है ज़रा-सी हुकूमत
यहाँ लोग हक़ को कुचलने लगे हैं
अरे 'काज़ी' क्या पूछते हो ग़ज़ल का
ये मिसरे तो दिल से निकलने लगे हैं
Dr Wasif Quazi