लोग समझें हैं शायरी मेरी
अस्ल में है ये ज़िंदगी मेरी
ख़ुद को बर्बाद हो ही जाने दूँ
अब इसी में है बेहतरी मेरी
मेरे आँसू पे सबको हैरत क्यूँ
चाहता कौन है ख़ुशी मेरी
दोस्त का फ़र्ज़ अब अदा कीजे
ढूंढिये आप भी कमी मेरी
दिन का जलता हुआ चराग़ हूँ मैं
देखिए आप मत हँसी मेरी
उनके ख़तिर भी मुझको जीना है
चाहतें हैं जो ख़ुदकुशी मेरी
हर दफ़ा ही मुझे लगा 'रूबी'
है ख़ता अबकी आख़िरी मेरी
Rubi Gupta satyendra