जब उसने पाँव दरिया में उतारे
हमारी लाश तब आई किनारे
न करिये बात इस लहजे में हमसे
अना पर चोट लगती है हमारे
किसी भी हाल ना त्यागेंगे तुमको
कवच कुंडल कोई कैसे उतारे
निकल आओ न मेरी जान बाहिर
कोई तस्वीर को कब तक निहारे
वो ऐसे ऐब छुड़वाती थी मेरे
कोई चावल से ज्यों कंकर बिचारे
अधेरा हो गया घर में अचानक
ये किसने कान से झुमाके उतारे
तेरे झुमकों से ऐसे खेलता हू
कि जैसे बाप बेटी को दुलारे
Arvind Inayat