कभी जब ख़्वाब देखूँ तो वतन का ही ख़याल आए
महकते उस हसीं दिलकश, चमन का ही ख़याल आए
पढूँ जब भी ग़ज़ल कोई, तिरे होंठों की हसरत में
मुझे हर लफ़्ज़ में तेरे, सुख़न का ही ख़याल आए
मुकम्मल हो गई है अब, रिहाई उस परिंदे की
मगर पर देखते ही फिर, घुटन का ही ख़याल आए
बहारों पर करूँ कैसे, यक़ीं मैं अब ज़माने में
कली गुल की छुऊँ मैं जब, चुभन का ही ख़याल आए
पहन लूँ रेशमी जोड़े, ज़माने को दिखाने को
सजाऊँ जिस्म को अपने, कफ़न का ही ख़याल आए
भला 'क़ाज़ी' ज़माने में, सुकूने-दिल कहाँ ढूँढें
जहाँ भी बैठ जाऊँ मैं, थकन का ही ख़याल आए
Dr Wasif Quazi