सच्चाई की राह दिखाती कविता लिखनी थी लेकिन
मानव जीवन को भटकाती कविता लिखने बैठे हैं
क्या युग हमको माफ़ करेगा?
कवि की कविता जाग उठी थी क्रौंच मारता व्याध देखकर
मेरी कलम मौन है लेकिन सहस कोटि अपराध देखकर
उपजा गान आह से होगा लेकिन आह नहीं दिखती है
पीर पराई देख न सकते और कराह नहीं दिखती है
अमराई की बाग लगाती कविता लिखनी थी लेकिन
हम जंगल में आग लगाती कविता लिखने बैठे हैं
क्या युग हमको माफ़ करेगा?
विरुदावलियां खूब गवा लो राजाओं के दरबारों पर
और नये गीतों की लड़ियां सत्ता बैठी सरकारों पर
भले निरंकुश राजा हो पर 'हां में हां' का स्वर जारी है
चाटुकारिता ऐसी है कि राजा है या अवतारी है
छोटे बच्चों सी तुतलाती कविता लिखनी थी लेकिन
एक बेसुरा राग बजाती कविता लिखने बैठे हैं
क्या युग हमको माफ़ करेगा?
हमें एकता गीत था गाना पर बंटवारा चाह रहे हैं
हमें राह दिखलानी थी पर हमीं भटकती राह रहे हैं
हमको जीवनज्योति था बनना अंधकार बनकर बैठे हैं
निर्विकार बन सकते थे पर खुद विकार बन कर बैठे हैं
कान्हा सी बांसुरी बजाती कविता लिखनी थी लेकिन
असुरों का उत्साह बढ़ाती कविता लिखने बैठे हैं
क्या युग हमको माफ़ करेगा?
शुभम तिवारी