वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

कब कहा-माहताब मत देखो।
कर के नीयत ख़राब मत देखो।

दिल से पूछो गुनह-सवाब है क्या?
रोज़ दीनी किताब मत देखो।

देखने का ये क्या सलीक़ा है,
गुल को यूँ बेहिसाब मत देखो।

है नदी की परख रवानी से,
ठहरा-ठहरा ये आब मत देखो।

अपनी थाली की रोटियाँ देखो,
उनके शाही कबाब मत देखो।

ख़ैर-मक़्दम करो चराग़ों का,
डूबता आफ़ताब मत देखो

रुतबा-ए-चश्म बरक़रार रखो,
अच्छा देखो, ख़राब मत देखो।

और क्या देखने के लायक़ है?
किसने बोला है ख़्वाब मत देखो।

ज़िन्दगी बेहिसाब ही अच्छी,
ऐ 'अकेला' हिसाब मत देखो।
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'