कौन आया सर पे छप्पर तान देने के लिए।
लोग हैं तत्पर यहाँ बस ज्ञान देने के लिए।
और क्या उम्मीद हम जल्लाद से रखते भला,
की गुज़ारिश मौत कुछ आसान देने के लिए।
ऐ अँधेरे तेरे मंसूबे नहीं होंगे सफल,
दीप है हर पल सजग बलिदान देने के लिए।
क्या बताएं, भक्ति पर हम ही अडिग कब रह सके,
ईश तो प्रतिबद्ध थे वरदान देने के लिए।
दीप की लौ ने ज़रा सा इक इशारा क्या किया,
हो गए हाज़िर पतंगे जान देने के लिए।
मित्र ! तुमने कम से कम संवेदना तो व्यक्त की,
शुक्रिया, मेरी व्यथा पर ध्यान देने के लिए।
ऐ 'अकेला' क्या करूँ उन पर ही दिल आता रहा,
जो भी चीज़ें थीं मुझे नुक़सान देने के लिए।
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'