बीते पलों के फिर वही मौसम नहीं हुए
तुम भी नहीं हुए तो कभी हम नहीं हुए
कितनी कलाइयाँ कटीं कितने टँगे मिले
बेरोज़गार फिर भी यहाँ कम नहीं हुए
गांधी, सुभाष और भगत को पढ़ा मगर
उनकी तरह तो आज तलक हम नहीं हुए
औरत पे ही तमाम लगीं बंदिशें वहाँ
आदम के भेष में जहाँ आदम नहीं हुए
कितने ही गीत और ग़ज़ल कह चुके सभी
आलोचकों की आँख में ऑसम नहीं हुए
चूल्हों में झोंक दी गईं ज़िंदा ही औरतें
शौहर हुए जहाँ, कभी हमदम नहीं हुए
कितनी उदास होके उठी होंगी सब ‘अना’
लाशें वो जिनपे ठीक से मातम नहीं हुए
Anamika Singh