Anamika Singh

चारो तरफ ही आज हैं मंज़र तबाही के
फिर भी शिकन न माथे पे ज़िल्ल-ए-इलाही के

दिखता भले है साथ मगर काटता है जड़
निकलेंगे उल्टे मायने उसकी गवाही के

इक 'ना!' पे होते हैं यहाँ एसिड अटैक उफ़्फ़!
समझेंगे लोग मायने कैसे मनाही के

चढ़कर किसी की पीठ पे पाते हैं जो मकाम
क़ाबिल किसी भी तौर न हैं वाह-वाही के

कैसे गटक गयी हैं कभी सोचिए तो आप
ये बिसलरी की बोतलें दिन वे सुराही के

बचपन के चार दिन में जो हासिल रही हमें
मन पर निशान अब भी हैं उस बादशाही के

सर से उतरके आता पसीना है पैर तक
चढ़ती है तन पे तब कहीं वर्दी सिपाही के
Anamika Singh