झुलसती देह, सूखे होंठ, पैरों में पड़े छाले
न दिखते हैं उन्हें जिनकी लगे हैं आँख पर जाले
बहुत छोटी-सी चादर है, ढँके जो पाँव, सर खुलता
पिता औलाद की ख़ातिर भला सपने भी क्या पाले
वो 'चंदा' चाहती है, काश! इक दिन हो कभी ऐसा
ज़रा रफ्तार अपने हौसले को दे, उछल पा ले
तबीयत है बड़ी नासाज़ जल, जंगल, पहाड़ों की
हमारी बदसलूकी ने गगन में छेद कर डाले
चुभी होगी सुई कितनी किसी उँगली में कब सोचा
ख़रीदे मोल कर-करके कभी गजरे, कभी माले
उड़ाकर ले गई है साथ बच्चों की जुराबें तक
हवा थोड़ी-सी माथे पर तो अपने सलवटें डाले
Anamika Singh