कभी जो भूल से होंठों पे हक़ की बात आयी
हथेली की दो गालों पर छपी सौगात आयी
कठिन ही था उसे जब प्यास लेकर और जीना
घड़े और आदमी के बीच फिर-फिर जात आयी
मुहब्बत किस तरह परवान चढ़ती ऐ ज़माने!
कहीं मज़हब, कहीं भौंहें सिकोड़े जात आयी
निवालों पर न रोज़ी पर हुई चर्चा अभी तक
मगर नागा बिना हाकिम के मन की बात आयी
जहाँ तुम भी न आये थे, जहाँ हम भी न आए
वहाँ पर भी हुए हैं दिन, वहाँ भी रात आयी
Anamika Singh