Anamika Singh

सबने देखे हैं नाचते किन्नर
नहीं देखे तो बस थके किन्नर

कोई सूरज सुबह नहीं लाता
रोज़ करते हैं रतजगे किन्नर

देने आते दुआएँ हर घर में
यानी हैं भेद से परे किन्नर

भेद कुनबे सहित करे दुनिया
फिर भी हँसते हैं बावरे किन्नर

देह का क्या कुसूर है बोलो
सोचते होंगे अधबने किन्नर

कितने खाली हैं देते गाली हम
पर दुआओं से हैं भरे किन्नर

आँख की किरकिरी लगें जब भी
आते हैं नेग माँगने किन्नर

भौंहे तानी हैं सारी दुनिया ने
जब भी हक़ के लिए लड़े किन्नर

माना हैं चिड़चिड़े मगर सोचो
तोड़ते हैं क्यों दायरे किन्नर

देह के ये तिलिस्म वश में कब
सोच से हैं कहीं बड़े किन्नर
Anamika Singh

Anamika Singh | We The Sukhanwar