सबने देखे हैं नाचते किन्नर
नहीं देखे तो बस थके किन्नर
कोई सूरज सुबह नहीं लाता
रोज़ करते हैं रतजगे किन्नर
देने आते दुआएँ हर घर में
यानी हैं भेद से परे किन्नर
भेद कुनबे सहित करे दुनिया
फिर भी हँसते हैं बावरे किन्नर
देह का क्या कुसूर है बोलो
सोचते होंगे अधबने किन्नर
कितने खाली हैं देते गाली हम
पर दुआओं से हैं भरे किन्नर
आँख की किरकिरी लगें जब भी
आते हैं नेग माँगने किन्नर
भौंहे तानी हैं सारी दुनिया ने
जब भी हक़ के लिए लड़े किन्नर
माना हैं चिड़चिड़े मगर सोचो
तोड़ते हैं क्यों दायरे किन्नर
देह के ये तिलिस्म वश में कब
सोच से हैं कहीं बड़े किन्नर
Anamika Singh