अजब सा नूर है फैला हुआ गगन पर भी
नज़र ठहर न सकी यार इक बदन पर भी
लहू से लिख गया तहरीर-ए-दर्द का मौसम
गुदाज़ आ ही गया आख़िर मिरे सुख़न पर भी
हवा ने ख़ाक उड़ा दी तमाम राहों की
मगर यक़ीन रहा अपने ही चलन पर भी
हर एक दौर ने सच बोलने की क़ीमत ली
लिखा गया है मिरा नाम इक कफ़न पर भी
गुलों की ओट में काँटों का राज़ पलता है
निगाह रख कभी ऐ दोस्त इस चमन पर भी
न पूछ हश्र-ए-दिल-ए-ज़ार बारहा कामिल
लहू के दाग़ हैं अब तक मिरे सुख़न पर भी
Kunal kumar