तुम जो बचपन के तरफ़दार नहीं हो सकते
फिर किसी दौर के मेमार नहीं हो सकते
नफ़रतें ओढ़ के जो चैन से सो सकते हों,
मोतबर कल के तो हक़दार नहीं हो सकते।
संगो-लाठी से सवालों को कुचलने वालो,
शाह हो सकते हो, सरदार नहीं हो सकते।
जो हिफ़ाज़त के बहाने से सितम ढाते हों,
वो मेरे मुल्क के सालार नहीं हो सकते।
दीन की आड़ में वोटों को बंटाने वाले,
तो, किसी क़ौम के ग़मख़्वार नहीं हो सकते।
ज़हन में ज़हर भरा और ज़ुबाँ पर गाली,
ऐसे कमज़र्फ असरदार नहीं हो सकते।
जो हुनरमंद के मज़हब से हुनर को जाँचें,
वो कभी फ़न के परस्तार नहीं हो सकते।
Satyendra Bharill