हाथ किताबों वाले थे जो , ढालों से टकराए, बहुत
उनसे जवाब नहीं बन पाये तो डंडे बरसाए बहुत
उलटे सीधे ख्वाब सजाए फिरती है सारी जनता
उसने शरीफ इंसान यहाँ पर वादों से बहलाए बहुत
जिस्मों को घायल क्यों ना करते 'जामी' वो लाठी डंडे
फिर परवाज़े फ़िक्र ने आखिर पर भी तो फैलाए बहुत
MOHAMMAD RAFAY JAAMI