Tabrejraftaar

है लज़्ज़त-ए-वहशत की ये तस्कीन सलामत
दो-चार भरे ज़ख़्म, तो दो-तीन सलामत।

तू अपनी इनायत भी उठा, और निकल जा,
रह जाए मेरी हुरमत-ए-तौहीन सलामत।
Tabrejraftaar