विवश हृदय है शरशैया पर,
घाव स्वयं की जीत लिखेगा।
समय आख़िरी गीत लिखेगा।
हमने छंद लिखे जीवन के, मुखर मौन ने उनको बाँचा।
दिनमानों के अवसानों को, दीप शिखा की लौ ने जाँचा।
जीवन वन में भटक रहे हम, इधर सुलझते उधर उलझते।
जिसमें हम उपयुक्त नहीं थे, हमें मिला वह जीवन-साँचा।।
वर्तमान के रिक्त पृष्ठ पर,
सब कुछ साफ़ अतीत लिखेगा।
समय आख़िरी गीत लिखेगा।
आशाओं के कोलाहल में, साँसों का स्वर थमते देखा।
उत्साहों वाली नाड़ी में, रुधिर कणों को जमते देखा।
जिसके अश्रु पिए थे हमने, उसने आँखों में नमियाँ दीं।
अनजाने रिश्ते अपनाकर, नीरस मन को रमते देखा।
निश्छल मन की कोमलता पर,
सब कुछ छल अविनीत लिखेगा।
समय आख़िरी गीत लिखेगा।।
भ्रमरों का गुंजन ठहरेगा, अब झींगुर ही प्रश्न करेंगे।
पीर - प्रेयसी की इतराकर, अँधकार ही माँग भरेंगे।
जीवन की ऊँची ज्वालाएँ, तन–मन सारा राख करेंगी।
सबको अपने घर की जल्दी, अब वे लोग नहीं ठहरेंगे।।
सन्नाटा जीवन का आख़िर,
शोक धुनी संगीत लिखेगा।
समय आख़िरी गीत लिखेगा।।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'