रेत पर धूप में चलाती है
ज़िन्दगी यूँ भी आज़माती है
बीज यूँ ही शजर नहीं होते
पहले मिट्टी उन्हें गलाती है
क्या करे गाँव में अकेली माँ
चाँद को लोरियाँ सुनाती है
गाँव से शह्र में गई लड़की
एक हिरनी सी अकबकाती है
'अब्र' तेरी ये हड़बड़ाहट ही
राह की मुश्किलें बढ़ाती है
Anuj Abr