Anuj Abr

रेत पर धूप में चलाती है
ज़िन्दगी यूँ भी आज़माती है

बीज यूँ ही शजर नहीं होते
पहले मिट्टी उन्हें गलाती है

क्या करे गाँव में अकेली माँ
चाँद को लोरियाँ सुनाती है

गाँव से शह्र में गई लड़की
एक हिरनी सी अकबकाती है

'अब्र' तेरी ये हड़बड़ाहट ही
राह की मुश्किलें बढ़ाती है
Anuj Abr

Anuj Abr | We The Sukhanwar