ख़ूँ-फ़िशाँ है दश्त-ए-हसरत, ज़ोर-ए-तश्ना-काम से
नक़्श-ए-पा-ए-मर्ग खींचा, हम ने तेग़-ए-गाम से
जल्वा-ए-सद-रंग है या सोज़-ए-पिनहाँ की ख़लिश?
दिल दहक उठता है अक्सर हुस्न के इबहाम से
महर-ए-नीम-अफ़रोज़ अब तो तौक़-ए-ला-मौजूद है
हो गया तारीक आलम, गर्दिश-ए-अय्याम से
कुश्तनी है अब नियाज़-ए-वहशत-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं
बच के निकलेंगे कहाँ हम, ज़हर-ए-बे-दुशनाम से
मर्ग-ए-हस्ती बन गई ताबीर-ए-रुसवाई-ए-इश्क़
यख़-ब-दामन है जुनूँ, इस सोज़-ए-बे-अंजाम से
तौक़-ए-मिन्नत क्यों पहनें हम असीर-ए-ज़ब्त हैं
ख़ूँ टपकता है मुदाम इस चश्म-ए-बे-दुशनाम से
नज़्र-ए-आतिश हो चुका है ख़िरमन-ए-अंदाज़-ए-हुस्न
अब तो वहशत आ रही है दश्त-ए-बे-आराम से
हब्स-ए-मर्कज़ बन गया अब, ज़ब्त-ए-वहशत ग़ाम-ए-दिल
ख़ूँ-ब-दामन रह गए हम, साया-ए-पुर-बाम से
बर्क़-ए-अंदाज़-ए-ग़ज़ब है, जुम्बिश-ए-मिज़्गान-ए-यार
क़त्लगाह-ए-इश्क़ चमकी, तेग़-ए-कज-आशाम से
फ़िक्र-ए-तश्हीर-ए-जुनूँ फ़ज़्ल आबिदी लाज़िम नहीं
नूर फैला है लहू का, बे-कसी के नाम से
Fazal Abbas Aabdi