रंगत है इसमें कोई न ख़ुशबू न फूल है
ये ज़िंदगी भी दश्त में तपता बबूल है
लोगों से बेवफ़ाई का शिकवा फ़ुज़ूल है
हमने उमीद की ये हमारी ही भूल है
हो अपना दिल दुखी तो ये लगता है बारहा
जैसे हर एक शख़्स जहां में मलूल है
वो जा चुका है कब का मगर आज भी मेरे
हर ख़्वाब हर ख़याल में उसका शुमूल है
तू बात कर न कर तेरी मर्ज़ी पे है ये अब
तेरा हर एक फ़ैसला हमको क़ुबूल है
वापस पलट के आएगा जो दे रहे हैं हम
इस ज़िंदगी का दोस्तो ये ही उसूल है
इक रोज़ छँट ही जाएगी “मधुमन” ये देखना
जो ज़िंदगी पे वक़्त की गर्दिश की धूल है
Madhu Madhuman