Ajay madhosh

रात आँखों को ऐसे खलती है
जैसे सीने पे रेल चलती है

नींद एक दम से क्यूँ नहीं आती
जब कि जाँ दम ब दम निकलती है

वो बदलती है अपना रुख़ जैसे
रेल पटरी कोई बदलती है

थाम लेती है इक उम्मीद मुझे
एक उम्मीद जब भी ढलती है

कैसे रक्खूं मैं इख़्तियार भला
ज़िंदगी बर्फ़ सी पिघलती है

जब टहलता है चाँद रातों को
चाँदनी साथ साथ चलती है

मौत मदहोश दर हक़ीक़त है
ये कहाँ टालने से टलती है
Ajay madhosh