उम्र तन्हा तमाम करते हैं
अब दुआ न सलाम करते हैं
लफ़्ज़ सारे फ़ना हुए जिस दिन
ख़ामुशी से कलाम करते हैं
अश्क आँखों के ज़ब्त कर के हम
मुस्कुरा कर पयाम करते हैं
ज़ुल्म सह कर भी इस ज़माने में
हम वफ़ा का निज़ाम करते हैं
मुद्दतों से हमारे सीने में
ग़म मुसलसल क़ियाम करते हैं
आशिक़ी में फ़ना हुए लेकिन
हम वफ़ा को दवाम करते हैं
पूछ 'क़ाज़ी' न हाल तू मेरा
ज़िंदगी उस के नाम करते हैं
Dr Wasif Quazi