चोट अपनी अना पर गवारा नहीं,
इसलिए मैंने उसको पुकारा नहीं।
हमने सोचा नहीं, फ़ैसला कर लिया,
जो हमारा नहीं, वो तुम्हारा नहीं।
शहर जलता रहा, हम तमाशा बने,
क्यों ख़ुदा को भी हमने पुकारा नहीं।
वो जो तन्हाइयों में रहा रात-दिन,
उसको कोई भी महफ़िल गवारा नहीं।
हमने देखा है बाज़ार-ए-इश्क़ को,
इस तिजारत में कोई ख़सारा नहीं।
जब सदा उसको दी मैंने ताख़ीर से,
उसको लगता है मैंने पुकारा नहीं।
ज़िन्दगी से ही सब कुछ तो सीखा-पढ़ा,
इससे बढ़ के यहाँ पर इदारा नहीं।
"मैं अकेला बहुत देर चलता रहा",
फिर वही रास्ता अब दुबारा नहीं।
Dr prem dhingra Dhingra