Shazia niyazi

उजलत में ख़ुदकुशी की तरफ़ मैं नहीं गई
ये इश्क़-ओ-आशिक़ी की तरफ़ मैं नहीं गई

हर गाम पर मिले थे मुझे कुछ ग़म-आशना
इसके सिवा किसी की तरफ़ मैं नहीं गई

काफ़ी था मेरी प्यास को गाँव का इक कुँआ
बहती हुई नदी की तरफ़ मैं नहीं गई

कुछ हम-मिज़ाज लोगों में ख़ुद को बसर किया
बे-रब्त शाइरी की तरफ़ मैं नहीं गई

मिलता नहीं ग़मों को मिरे बाद सर-परस्त
ये सोचकर ख़ुशी की तरफ़ मैं नहीं गई

इस बार मैंने तंग सिलाई है आस्तीन
सद-शुक्र दोस्ती की तरफ़ मैं नहीं गई
Shazia niyazi

Shazia niyazi | We The Sukhanwar