नफ़रतों को जो रिहाई दे रहा है
वो मुहब्बत की दुहाई दे रहा है
सामने जो दे रहा था कल दुआएँ
पीठ पीछे वो बुराई दे रहा है
जुर्म अपना आइने से वो छुपा कर
झूठ की वो सौ सफ़ाई दे रहा है
दोस्त मेरा बन गया है आज मरहम
दर्द को कैसी दवाई दे रहा है
रास्तों पर छा गया है जब अँधेरा
नूर उसका ही दिखाई दे रहा है
मीर-ए-महफ़िल बन गया है आज जो भी
क़ातिलों को रहनुमाई दे रहा है
क्या मिला है आशिक़ी में आज 'काज़ी'
यार ही अब बेवफ़ाई दे रहा है
Dr Wasif Quazi