Dr Wasif Quazi

नफ़रतों को जो रिहाई दे रहा है
वो मुहब्बत की दुहाई दे रहा है

सामने जो दे रहा था कल दुआएँ
पीठ पीछे वो बुराई दे रहा है

जुर्म अपना आइने से वो छुपा कर
झूठ की वो सौ सफ़ाई दे रहा है

दोस्त मेरा बन गया है आज मरहम
दर्द को कैसी दवाई दे रहा है

रास्तों पर छा गया है जब अँधेरा
नूर उसका ही दिखाई दे रहा है

मीर-ए-महफ़िल बन गया है आज जो भी
क़ातिलों को रहनुमाई दे रहा है

क्या मिला है आशिक़ी में आज 'काज़ी'
यार ही अब बेवफ़ाई दे रहा है
Dr Wasif Quazi