Sanjivv Kummar

मर जाते हैं ग़रीब बस उनके यक़ीन पर
वो मिट्टी भी न डालते दो-गज़-ज़मीन पर

लगता है तुझसे प्यार सभी करते हैं बहुत
कुछ हैं निशान आँसुओं के आस्तीन पर

जम्हूरियत मिली है हमें किस तरह की ये
नाचे अवाम आज भी इनकी ही बीन पर

मर्दों की हरकतों से रिवायत ही बन गई
रहता नक़ाब आज तभी तो हसीन पर

गर खींचने हों पाँव किसी के ज़मीन से
नीचे तो तुमको झुकना पड़ेगा ज़मीन पर
Sanjivv Kummar