Tahseen Abdul Rasheed

साथ उसके जो कई साल बिताए हमने
सब के सब उसको मनाने में गँवाए हमने

उस पे मख़्सूस खुशामद थी हमारी, वरना
ऐसे रूठे हुए हरगिज़ न मनाए हमने

क्यों करें ख़ून के रिश्तों को मुअत्तल आख़िर
आरज़ी रिश्ते भी शिद्दत से निभाए हमने

अब कहीं जा के मिटी उसकी महक कमरे से
सारे ख़त करके जमा उसके जलाए हमने

सीख कर दुनिया से रंगों की कलाकारी फिर
जिसको जो रंग दिखाने थे दिखाए हमने

गिरया-ए-इश्क़ ने आँखें ही सुखा डाली थीं
चंद आँसू बड़ी मुश्किल से बचाए हमने

माल जैसा दिया, कीमत भी वसूली वैसी
खोटे सिक्के न तिजारत में चलाए हमने

उसको तहसीन कहाँ, एक नज़र देख लिया
और सरदर्द लिया बैठे-बिठाए हमने
Tahseen Abdul Rasheed