इस मुल्क की गलियों में अजब शोर मचा है,
हर सच पे सियासत का कोई पहरा लगा है।
यूँ शोला-बयानी ने किया वार दिलों पर,
अल्फ़ाज़ का हर तीर निशाने पे लगा है।
कुर्सी के लिए बाँट दिए धर्मों में इंसान,
लोगों में अदावत का यहाँ ज़हर भरा है।
इंसाफ़ की चौखट पे भी ख़ामोश खड़ा है,
मज़लूम का फिर दर्द यहाँ किसने सुना है।
तामीर के दावों में कई घर भी जले हैं,
वो ख़्वाब-ए-तरक़्क़ी जो है धुँधला ही पड़ा है।
"जामी" ने तो चाहा था मोहब्बत का उजाला,
पर शहर के हर मोड़ पे अँधेरा खड़ा है।
MOHAMMAD RAFAY JAAMI