एक दिन मुझको मिली ज़िन्दगी
सँग में बैठ लगी बतियाने!
पूछ रही थी हाल वो मुझसे
कैसी हो? हम भी तो जाने!!
मैंने पूछा, इतनी निष्ठुर! क्यों होती हो यार ज़िन्दगी?
सबकी इतनी अच्छी कैसे! अपनी क्यों बेकार ज़िन्दगी?
मुझसे बोली, अरे बावरी! सबके हिस्से हैं ख़ुशियाँ-ग़म
किसी को देती घाव अगर तो उसको मैं ही देती मरहम
इसको देखो! उसको देखो!
सबके नाम लगी गिनवाने!
एक दिन मुझको मिली ज़िन्दगी
सँग में बैठ लगी बतियाने!!
पूछा मुझसे, क्यों छोड़े? वो सपने जो मैंने दिखलाए?
क्यों मंजिल की चाहत त्यागी? क्यों तुमने रस्ते बिसराए?
अरी ज़िन्दगी! तुम्हें पता क्या! क्या होता है जग से लड़ना
अपनों की नफ़रत को सहकर सपनों के पथ आगे बढ़ना
इतना ही मैं बोल सकी थी
लगे ये नैना नीर बहाने!
एक दिन मुझको मिली ज़िन्दगी
सँग में बैठ लगी बतियाने!!
कहा, सखी! तुम आँसू पोछो, अब जो कोई सपन सजाना
रखना खुद पर जरा भरोसा, तक़लीफ़ों से मत घबराना
दुनिया का तो काम ही होता, रस्तो में काँटों को बोना
औरों की परवाह में अब तुम, आगे से ख़ुद को मत खोना
सुनके उसको हृदय खिल उठा
दुःख से लगा था जो मुरझाने!
एक दिन मुझको मिली ज़िन्दगी
सँग में बैठ लगी बतियाने!!
Rinki Singh