यक़ीन मुझको कभी बेज़ुबान बोलेगा,
ज़मीन चुप है मगर आसमान बोलेगा।
सबूत क़त्ल के तुम अब नहीं छुपा सकते,
कफ़न को फाड़ के मुर्दा बयान बोलेगा।
रईस बन गए हो तुम कमा के धन लेकिन,
तुम्हारे लहजे से तो ख़ानदान बोलेगा।
बदलना राख में हर शख़्स को है आख़िर में,
सभी का हश्र तो इक दिन मसान बोलेगा।
अगर पसरता रहा आस-पास सन्नाटा,
तो शोर गूँजेगा, कानों में कान बोलेगा।
हमारा दिल भी तरफ़दार है तुम्हारा ही,
हमें पता था तुम्हारी ज़ुबान बोलेगा।
बुलंदियाँ थीं कभी साथ, अब ये वीरानी,
हमारे दिल का ये खाली मकान बोलेगा।
दबा के दुम ही तो भागेंगे 'अब्र' ज़ालिम सब,
ख़िलाफ़ उनके जो सारा जहान बोलेगा।
अब्र लखनवी