मेरे साजन! बिन तुम्हारे!

धरा शीतल हो गई है,किन्तु मेरा मन जले है।
तुम नहीं जो साथ हो तो यह सुखद मौसम खले है।
शूल से लगते हैं मुझको फूल ये बगिया के सारे।
बीत न जाए ये सावन, मेरे साजन! बिन तुम्हारे।

तुमसे ही हर शाम मेरी, तुमसे ही सारे सवेरे।
तुमसे ही सब प्रार्थनाएं, तुमसे ही उत्सव हैं मेरे।
दिल के अंबर पर घिरे हैं निराशाओं के बादल।
भाये न हाथों को कंगन, भाए न नैनों को काजल
मन जो मुरझाया हुआ हो, कैसे कोई तन सँवारे!
बीत न जाए ये सावन, मेरे साजन! बिन तुम्हारे।

प्रीत का हर गीत मेरे मन को छलनी कर रहा है।
और इक सावन मेरे इन लोचनों से झर रहा है।
मेरे मन की इस दशा का कब तुम्हें अनुमान होगा?
इस विरह की वेदना का कब तुम्हें कोई भान होगा?
आ भी आओ अब पिया कि बाग़ का झूला पुकारे
बीत न जाए ये सावन, मेरे साजन! बिन तुम्हारे।

नित हृदय में उठ रहा है भावना का ज्वार-भाटा।
कैसे तुमको ज्ञात होगा? कैसे इक-इक दिन है काटा।
सुनो! अब न बिन तुम्हारे एक पल मुझसे कटेगा।
तुम बताओ कब भला यह विरह का बादल छटेगा?
कब भिगायेंगे हमें ये प्रेम के शीतल फुहारे?
बीत ना जाए ये सावन, मेरे साजन! बिन तुम्हारे।
Rinki Singh

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