किसी को भूलकर देखें, किसी की याद से निकलें
मरासिम कुछ नए ढूँढ़ें, दिल-ए-नाशाद से निकलें
मुहब्बत एक पल भी चैन से जीने नहीं देती
ज़रूरी हो गया है हम, तेरी रूदाद से निकलें
दुहाई देने से आख़िर किसी को क्या हुआ हासिल
कभी तो अपना हक़ माँगें, कभी फ़रियाद से निकलें
कभी दुनिया ने फेंके थे, जो पत्थर बारहा मुझपर
ये मुमकिन है किसी दिन वो मेरी बुनियाद से निकलें
ज़माना मान ही लेगा कि हम अच्छे सुख़नवर हैं
मुकर्रर से करें तौबा! किसी दिन दाद से निकलें
अजब ये क़ैद है दिल की, सुकूँ का पल नहीं मिलता
चलो ये बंदिशें तोड़ें, हर इक बेदाद से निकलें
Devmani Pandey